एक देश, एक झंड़ा, एक संविधान
कश्मीर नहीं, कश्मीरियत को भी बाहें खोल कर अपनाइए
कश्मीर से जुड़ी यादें कितनी सुर्ख हैं ना...चाहे सेब हो...चाहे केसर या फिर बहता हुआ लहू.....उफ्फ...नफरत के सिलसिले को कहीं तो खत्म होना ही चाहिए...केसर की क्यारियों को महकने दीजिए। एक सवेंदनशील समय में संवेदना खोना...एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया है...मंजिल तक पहुंचने के लिए हर कदम फूंक-फूंक कर रखना होगा।
श्रुति अग्रवाल
जम्मू कश्मीर में 370 के खात्मे की पहल। गृहमंत्री ने अनुच्छेद 370(1) के अलावा सभी खंड हटाने का संकल्प पेश किया। हम सभी को अभी बस शांत रहना है। शांति-धीरज-सौहार्द-भाईचारा, इसी पर टिका है हमारा लोकतंत्र। किसी तरह के बहकावे से बचना जरूरी है। ना तो राजनीति का मोहरा बने, ना धर्म को धतूरा ही बनने दें। इतिहास को खूनी पंजों से खरोंचना बंद होना चाहिए। हम सभी को साथ मिलकर-कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ना चाहिए। हमें आजाद हुए 70 साल हो गए हैं...पुरानी गलतियों को सबक बना नए रास्ते पर चलने का समय आ गया है। जिन्हें लग रहा है धारा 370 बनी रहना चाहिए उनसे सिर्फ एक सवाल...दशकों से चल रही यह धारा मेरे कश्मीरी मित्रों को भी सुरक्षा नहीं दे पाई। मेरे मित्रों से जब भी कश्मीर यात्रा के लिए जिक्र करूं वे कहते हैं , यहां जाना...यहां मत जाना...मत जाना ???? यदि इस धारा से उनके अंदर का डर भी तो दूर ना हुआ तो यह धारा किस काम की।
कश्मीर की कश्मीरियत से जान-पहचान छिंदवाड़ा में हुई थी। पचमढ़ी के पास बेहद ठंडा शहर हुआ करता था छिंदवाड़ा ( अब पहले से काफी गर्म हो गया)। वहां कश्मीर के फेरी वाले सूट के कपड़े लाया करते थे, माँ उस समय सलवार सूट पहनती ना थी...शायद कॉलोनी की कोई आंटी नहीं इसलिए वे हमारी गली नहीं आया करते थे। उनसे पहली मुलाकात मेरे सहेली के घर पर ही हो सकी...आंटी नर्स थी...वे हमेशा गरम सूट लेती थी...फेरी वाला उनके यहां हर साल आता था। मुझे कपड़ों से ज्यादा उनके पास से आने वाली खुशबू अच्छी लगती थी...साथ ही जब तक आंटी चाय चढ़ाती वो गुनगुनाते...ये गुनगुनाहट सम्मोहित करने वाली होती फिर एकाएक कश्मीर की वादियों में जहर घुला औऱ इन लोगों का आना ना के बराबर हो गया। पापाजी का ट्रांसफर भी छिंदवाड़ा से इंदौर हो गया...माँ ने अब भी सूट पहनना शुरु ना किया था लेकिन हम बहनें फ्रॉक से सूट का सफर तय करने की उम्र में थे। बड़ी दी को ज्यादा शौक था...इसलिए एक बार ये फेरी वाले हमारे घर भी आए और दीदी ने बड़ा सुंदर बॉटल ग्रीन रंग का सूट लिया हमें मरून रंग पर संतोष करना पड़ा हाँ पुरानी वाली गुनगुनाहट नदारत थी। फिर कुछ समय बाद एक अजब सा वाक्या हुआ...रविवार का ही दिन था...एक कालीन वाला आया, माँ ने उससे शेर की खूबसूरत सी कढ़ाई वाला पीला-लाल-सफेद-हरा रंग से सजा बेहद-बेहद सुंदर छोटा सा कालीन खरीदना चाहा। मुलायम सा था...उम्दा कारीगिरी...माँ ने उसे जमीन नहीं दीवान के ऊपर बिछाने का सोचा था...दीवान पर रख कर देखा भी...मोलभाव के बाद दाम भी तय हो गया...लेकिन वे पैसा घर के किसी पुरुष से ही लेना चाहते थे। माँ भी अड़ गईं...वो महाशय बिना कालीन बेचे चले गए...उसके बाद कश्मीर के किस्से सासू माँ की अमरनाथ यात्रा के साथ ही दस्तक दिए....वो मेरे लिए बेहद सुंदर काले रंग सलवार-सूट लाईं थीं। उसके अलावा तो हमने सिर्फ नकारात्मक खबरें ही ज्यादा देखी हैं अखबारों में...कश्मीर की किस्सागोई से हम लोग अलग ही रहे, इसलिए महरुम रहे कश्मीरियत से भी। घाटी में कई बार माहौल ज्वार-भाटे की तरह बदला...कभी खबरें आईं कभी पर्यटक वापस आने लगे तो कभी पत्थरबाजी...
अब सरकार ने एक कदम उठाया है। बड़ा और ऐतिहासिक कदम। धारा 370 लगाने वाले नेहरू जी ने भी कहा था...एक दिन घिसते-घिसते यह धारा खत्म हो जाएगी। धारा 35 ए तो अचानक ही आई थी और जाने के लिए ही आई थी ना। ये अलग है कि हमारे देश के नेता और कश्मीर के हुक्मरान सात दशकों बाद भी कश्मीर की आवाम को सुरक्षा-स्नेह-सम्मान का भरोसा ना दिला पाए। कश्मीर की सरकारें तो जैसे अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए आवाम को भड़काते रहे...मुख्यधारा से काटते रहे...विषवमन करते रहे। जो हाथ धारा 370 को बचाने के लिए जुड़ सकते थे...वही हाथ कश्मीरी बच्चों के हाथों में पत्थर आने के बाद अपने पांवों के साथ सड़क पर क्यों नहीं उतरें....नेत्री हैं और महिला भी...भटके बच्चों को वापस स्कूल पहुंचाने के लिए सड़कों पर उतरा जाता, तो आप बच्चों और कश्मीरियत दोनों को ही बचा लेती ना। स्कूल के बच्चों के हाथों में किताब की जगह पत्थर...तब अंतरआत्मा ने सवाल क्यों ना पूछे? इसके साथ ही एक बड़ा सवाल यह भी है कि आजादी के इतने सालों बाद भी हमें धरती के स्वर्ग पर सेना की तैनाती किसी बड़े निर्णय से पहले करनी पड़ी? व्यवस्था अलोकतांत्रिक थी लेकिन अलगाववाद हद से ज्यादा भी है, यह भी मानती हूं।
अब कश्मीर से फिर से तार जोड़ने का वक्त आ गया है। इसके लिए सबसे पहले हर आम और खास भारतीय को अपना हाथ बढ़ाना होगा, इतिहास को बिना कुरेदे वर्तमान को सुंदर बनाने और भविष्य की खुशहाली को सुरक्षित करने के लिए कदम आगे बढ़ाना होगा। इसके लिए सबसे पहले धारा 370 से आज तक कश्मीर को क्या फायदा हुआ यह समझना होगा...मुझे एक फायदा नजर ना आया। यदि धारा 370 इतनी कारगार होती...तो घाटी में आज अमन-चैन होता लेकिन अभी सिर्फ एक कदम उठा है...कदम ऐतिहासिक है लेकिन इसके दूरगामी परिणाम देखना है हमें। देखना होगा कि किस तरह सरकार कश्मीर के लोगों को मुख्यधारा से जोड़ती है लेकिन उससे पहले हम सभी को लोकतंत्र के सभ्य नागरिक होने का फर्ज निभाना होगा। प्रधानसेवक और ग्रहमंत्री की जोड़ी राजनीति के शतरंज में पहली चाल सफलता से चल चुकी है लेकिन आतंकवाद से ज्यादा अलगाववाद की सेना से मुकाबला करना बाकी है। जीत तो तब ही संभव है जब कश्मीर को ताकत नहीं मुहब्बत के बल पर अपना बना लिया जाए...जीत तो तब ही है जब फिर से वो फेरी वाला दरवाजे पर दस्तक दे जिसके पास से चारकोल औऱ इत्र की मिली-जुली महक आती थी..होठों पर गानों के बोल होते थे...आपके कान नहीं सुनना चाहते क्या...
बुमरो बुमरो श्याम रंग बुमरो...मुझे तो वापस चाहिए हर भौरों की गुनगुनाहट जो केसर की बगियों से होकर हमारे कानों तक आए....
चलिए सबसे पहले दस्तक देते हैं अपने आस-पास बसे हर कशमीरी के दिल पर बिना उसका धर्म-मजहब जाने...